जालौर.मांडवला।
जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के गच्छाधिपति आचार्यप्रवर पूज्य गुरुदेव मुनि श्री जिनमणिप्रभसूरी ने आज अपने शिष्यों मुनि मयंकप्रभसागर व मुनि मृत्युंजयप्रभसागर के साथ जहाज मंदिर मांडवला में मंगल प्रवेश किया। आचार्यश्री का विहार श्रीफली, जीवाणा, सायल, उमरैदाबाद होते हुए मांडवला पहुंचने पर जैन समाज द्वारा भव्य स्वागत किया गया।
इस अवसर पर आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि जहाज मंदिर हमारे लिये परम पावन तीर्थ है। यही वह पावन भूमि है जहां लगभग 40 वर्ष पूर्व गुरुदेव आचार्य जिनकांतिसागर सूरी का स्वर्गवास हुआ था, जिनकी स्मृति में ही इस जहाज मंदिर का निर्माण हुआ।
उन्होंने कहा— “जीवन में हर व्यक्ति को कभी न कभी किसी का सहयोग प्राप्त होता है। इसलिए हमें उपकारी को कभी नहीं भूलना चाहिए। जिस व्यक्ति ने हमारी किसी भी प्रकार से सहायता या उपकार किया है, उसका स्मरण जीवनभर बनाए रखना ही कृतज्ञता की सबसे बड़ी निशानी है।”
आचार्यश्री ने कहा कि यदि जीवन में शांति और आनंद चाहिए तो हमें उन घटनाओं को भूलना होगा जिनमें हमने किसी पर उपकार किया है, और याद रखनी होंगी वे घटनाएं जिनमें किसी ने हम पर उपकार किया।
उन्होंने कहा— “गुरुदेव आचार्य जिनकांतिसागर सूरी मेरे उपकारी थे, जिन्होंने मुझे दीक्षा दी और जीवन जीने की कला सिखाई।”
कार्यक्रम में जहाज मंदिर के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र बोहरा, ट्रस्टी रामरत्न छाजेड़, बाबूलाल सिंघवी, पारसमल बारडिया, सुनील बोहरा, राहुल बोहरा, जिगनेश सिंघवी, मोहित बोहरा, गौरव भंसाली, साहिल भंसाली, सिद्धू मालू, ऋषभ जैन, मुकेश प्रजापत सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।
आचार्यश्री की निश्रा में 11 नवम्बर को गुरु सप्तमी महोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जिसमें हजारों की संख्या में भक्तजन शामिल होंगे।

